लाइट नही हुआ करती थी तो लाल टेन में खेला करते थे गरबा 5 दशक में काफी बदलाव हुए पर नही बदली उपासना की परंपरा ।

गरियाबंद :-  नगर के बस स्टेंड स्थित राजू बीड़ी प्रांगण में सन् 1968 से गुजराती समाज द्वारा गरबा का आयोजन किया जा रहा हैं। बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक पारंपरिक परिधान में नौ दिनों पूरे भक्ति भाव से माता की उपासना करते हैं। नगर में वर्षो पूर्व गुजरात के अलग अलग हिस्से से आकर बसे गुजराती परिवारों ने राजू बीड़ी प्रांगण में गरबा के आयोजन के माध्यम से आज भी अपनी पुरानी परंपरा को जीवित रखा हुआ हैं।

नौ दिन तक बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक सभी रास गरबा करते हुए माता की उपासना करते है । गुजराती समाज का यह भव्य आयोजन समाज में लोगों के बीच भाईचारे का संदेश देता हैं. सब लोग एक साथ मिलकर गरबा खेलते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानों एक परिवार एक साथ एक मंच पर थिरक रहा हो. गुजराती समाज के वरिष्ट सदस्यो हरीश भाई ठक्कर और भारत वखारिया ने बताया कि उनके द्वारा 1968 से गरियाबंद के राजू बीड़ी प्रांगण में गरबे की शुरुआत की गई थी । उस वक्त लाइट नहीं हुआ करती थी । तब मैदान के चारो तरफ तीन चार लाल टेन और गैस लाइट रखकर गरबा किया करते थे ।

माइक और म्यूजिक सिस्टम नही हुआ करते थे कुछ महिलाएं घूंघट रखकर गाना गया करती और बाकी सदस्य रास गरबा करते थे । 55 साल के सफर में बहुत कुछ बदल गया है। मगर माता की आराधना करना हमने आज भी जारी रखा है । गुजराती समाज की महिलाओं ने बताया कि गरबा को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है ऐसे आयोजन नई ऊर्जा से भरने वाले होते हैं। ऐसे आयोजन हमारी संस्कृति समेत परंपराओं को पहचान कराती हैं. जो आने वाली पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शक बनने में सहायक होती है । हम ऐसा मानते है कि डांडिया नृत्य के समय डांडिया लड़ने से जो आवाज उत्पन्न होती है उससे पॉजिटिव एनर्जी आती है.। गरबा खेलने के अलावा पूरे नौ दिन अलग अलग तरह के आयोजन भी किए जाते ।

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