आदिवासी समाज के युवाओं ने बैठक के माध्यम से ग्रामीणों को सिखा रहे हैं आमचो CFR एप्प

जगदलपुर :- जिला प्रशासन के विशेष मदद से संचालित ATREE संस्था द्वारा वनअधिकार क़ानून 2006 के तहत सामुदायिक अधिकार और सामुदायिक वन संसाधन प्राशिक्षण गांव – गांव में दिया गया, प्रशिक्षण मे प्रशिक्षु के रूप मे आदिवासी समाज के प्रतिनिधि और वन अधिकार समिति के लोग उपस्थित हो रहे हैं ।कार्यशाला के दौरान Atree संस्था के समन्वयक संतु मौर्य, पूरन कश्यप , बनसिह मौर्य , सोमारू ,कमलेश कश्यप, रूपचंद नाग और अनुभव शोरी ने सामुदायिक वन संसाधन अधिकार प्राप्त करने के लिए ग्राम सभाओ की भूमिका और CR और CFR अधिकारो के लिए दावा करने के प्रत्येक चरणों क़ो विस्तार पूर्वक समझा रहे हैं , साथ ही गांव के वन और राजस्व नक्शो क़ो देखने के लिए बस्तर वेब GIS का प्रयोगात्मक उदाहरण पेश किये, ताकि ग्राम सभाओ क़ो दावा किये जा रहे वन और क्षेत्रफल क़ो समझने मे आसानी हो सीमा विवाद की परिस्थिति उत्पन्न न हो, बस्तर प्रसाशन और ATREE के सहयोग से निर्मित एप्प द्वारा गांव का सीमांकन के लिए आमचो CFR एप्प का उपयोगिता क़ो भी समझाया, कार्यशाला के दौरान भविष्य मे जंगल के सुरक्षात्मक उपयोग और प्रबंधन के उदेश्यों क़ो समझने और आजीविका क़ो मजबूत करने के लिए परिचर्चा भी किया जा रहा हैं । ग्रामीणों को समझ में आ रहा है कि राजस्व जमीन, फॉरेस्ट जमीन और पारंपरिक रूप से सीमा कैसे निर्धारण किया गया है । वन अधिकार समिति और ग्राम सभा द्वारा वन अधिकार कानून 2006 के तहत समुदायिक अधिकार के लिए ग्रामीण आगे आ रहे हैं।जिसके तहत वे अपने पारंपरिक सीमा को निर्धारित करते हुए सीमा का सीमांकन कर रहे हैं साथ ही ग्रामसभा को सशक्त करने के लिए लोगों के साथ अपने आज भी का पर्यावरण और संस्कृति को बचाने के लिए समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रम भी कर रहे हैं। समुदायिक वन अधिकार के तहत ग्रामीणों ने सीमांकन के साथ-साथ कानून की धारा 3 (1) “ख “एवं धारा 3 (1)” ग ” का फॉर्म भर रहे हैं।

एटीआरईई और जिला प्रशासन की साझेदारी पहल

अशोका ट्रस्ट फ़ॉर रिसर्च एनवायरनमेंट एंड इकोलॉजी(एटीआरईई) बेंगलुरू में स्थित एक शोध संस्थान है जो देश भर में वन अधिकारों और वन पारिस्थितिकी पर काम करने वाले जिला प्रशासन बस्तर के साथ सहयोग करता है। एटीआरईई अक्टूबर 2021 से सीएफआरआर मान्यता और प्रबंधन योजना के लिए बस्तर जिला प्रशासन के साथ साझेदारी कर रहा है। एटीआरईई टीम के सदस्यों अनुभव शोरी और लक्ष्मी नाथ (गोंडी में धाराप्रवाह) ने बस्तर के अंदरूनी इलाकों में लगातार 8 महीनों से जमीनी स्तर पर ग्राम सभा करके ग्रामीणों के साथ लगातार 8 महीने से अधिक की बातचीत में, उन्होंने सामुदायिक अधिकार और विशेष रूप से सामुदायिक वन संसाधन के बारे में जागरूकता पैदा करते हुए लोगों को जंगल की रक्षा, संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी लेने की जरूरत को समझाया। ग्रामीणों ने सहमति प्रदान करने के बाद और एटीआरईई की मदद से पारंपरिक वन संसाधन सीमा (बाहरी पीली रेखा) और खेती की सीमा (आंतरिक पीली रेखा) की मैपिंग की।
ATREE के टीम लीडर वैज्ञानिक, डॉ. शरद लेले का मानना है कि लोगों को उन्मुख संरक्षण सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका स्थानीय समुदायों के परंपरागत अधिकारों का सम्मान करना है। अधिकार-आधारित दृष्टिकोण वन्यजीव संरक्षण में स्थानीय समुदायों की पूर्ण भागीदारी हेतु आधार प्रदान कर सकता है ताकि जमीनी स्तर पर सुचारु रूप से सह-प्रबंधन, संरक्षण, आजीविका और स्थिरता के बीच दीर्घकालिक संतुलन सुनिश्चित हो सके। ATREE कांगेर-घाटी राष्ट्रीय उद्यान और बस्तर जिले में अन्य जगहों के आसपास के सभी गांवों के सीएफआर अधिकार मान्यता और सीएफआर प्रबंधन योजना बनाने में मदद कर रही है।पूरन सिंह कश्यप का कहना है की गांव के अंदर जितने भी प्राकृतिक संपदा है जितने भी पर्यावरण को सुरक्षित रखने वाले कारक है, साथ ही जितने भी जड़ी बूटियों को सुरक्षित रखने के लिए और इन को आगे बढ़ाने के लिए सामुदायिक सामुदायिक वन अधिकार के तहत सुनिश सुरक्षित किया जाएगा ।विगत वर्षों में बहुत से जड़ी-बूटी जंगलों से गायब हो रहे हैं। जो कि हमारे पारंपरिक उपचार का एक महत्वपूर्ण साधन था। इन सभी चीजों को सुरक्षित रखने और फिर से पुनर्जीवित करने के लिए यह कानून का उपयोग करना बहुत महत्वपूर्ण है, इससे ग्रामसभा को सशक्त किया जा सकता है । अपने जल ,जंगल ,जमीन और पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सकता है, साथ ही भविष्य में रोजगार के अवसर का केंद्र भी बनाया जा सकता है।वन अधिकार समिति और ग्राम सभा द्वारा वन अधिकार कानून 2006 के तहत समुदायिक अधिकार के लिए ग्रामीण आगे आ रहे हैं।जिसके तहत वे अपने पारंपरिक सीमा को निर्धारित करते हुए सीमा का सीमांकन कर रहे हैं साथ ही ग्रामसभा को सशक्त करने के लिए लोगों के साथ अपने आज भी का पर्यावरण और संस्कृति को बचाने के लिए समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रम भी कर रहे हैं। समुदायिक वन अधिकार के तहत ग्रामीणों ने सीमांकन के साथ-साथ कानून की धारा 3 (1) “ख “एवं धारा 3 (1)” ग ” का फॉर्म भर रहे हैं।

Live Cricket Live Share Market

जवाब जरूर दे 

[poll]

Related Articles

Back to top button
Close
Close